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पार्टनरशिप फर्म्स तथा बिज़नेस बेसिक्स की सारी जानकारी

किसी भी बिज़नेस को चलाने तथा इसके प्रॉफिट को शेयर करने के लिए 2 या 2 से अधिक पार्टियों के बीच किए गए एक फॉर्मल एग्रीमेंट को हो पार्टनरशिप के रूप में जाना जाता है। आज के इस आर्टिकल में हम पार्टनरशिप फर्म के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त करेंगे। पार्टनरशिप फर्म्स क्या है, इसको कैसे शुरू किया जाता है, आदि के बारे में सारी जानकारी आपको इस आर्टिकल के माध्यम से मिलेगी

एक पार्टनरशिप फर्म का निर्माण

एक पार्टनर कौन बन सकता है?

सबसे पहले तो आपको पार्टनरशिप फर्म के बारे में यह जान लेना चाहिए कि एक पार्टनरशिप फर्म में एक Individual के साथ-साथ एक Enterprise भी शामिल हो सकती है तथा एक पार्टनरशिप फर्म में पार्टनर बन सकती है। हालाँकि HUF डायरेक्टली पार्टनर नहीं बन सकते जबकि इसको एक अलग Entity के रूप में प्रेजेंट किया जाता है।

कितने पार्टनर मिलकर एक पार्टनरशिप फर्म बना सकते है?

न्यूनतम 2 पार्टनर तो एक पार्टनरशिप फर्म में होने ही चाहिए। इसके अलावा एक नॉन बैंकिंग फर्म में अधिकतम 20 पार्टनर हो सकते है तथा एक बैंकिंग फर्म में अधिकतम 10 पार्टनर हो सकते है।

फर्म का नाम कैसे रखे?

एक पार्टनरशिप फर्म का नाम बिना किसी लीगल अप्रूवल के कुछ भी रखा जा सकता है। अगर उस नाम से अन्य फर्म्स भी है तो भी किसी प्रकार की समस्या के बिना आप अपनी फर्म का नाम रख सकते है। हालाँकि कुछ फर्म्स अपने नाम में “and company” को एक Suffix के रूप में जोड़ती है लेकिन यह अनिवार्य नहीं है। लेकिन यहां पर ध्यान देने वाली बात यह है कि private limited या LLP जैसे Suffix एक पार्टनरशिप फर्म के नाम के पीछे नहीं जोड़े जा सकते। इन नामों को क्रमशः केवल प्राइवेट लिमिटेड तथा LLPs के लिए ही इस्तेमाल किया जा सकता है।

Partnership Deed कैसे बनाए?

एक पार्टनरशिप फर्म बनाते समय इसमें शामिल पार्टनर खुद मिलकर यह निश्चित कर सकते है कि फर्म में किस प्रकार के नियमों की पलना की जाएगी तथा सारा सिस्टम कैसे काम करेगा। इसी को Partnership Deed के नाम से जाना जाता है। इसमें पार्टनरशिप फर्म द्वारा किया जाने वाला बिज़नेस, अलग-अलग पार्टनर द्वारा लगाई जाने वाली कैपिटल, प्रॉफिट का बंटवारा, नए पार्टनर को शामिल करने की शर्तें आदि बातों को शामिल किया जाता है। एक Partnership Deed बनाने के पीछे किसी भी प्रकार के लीगल एक्ट को ध्यान में रखने की जरूरत नहीं है। यह उन पार्टनर्स पर निर्भर करता है कि वे अपने बिज़नेस को किस दिशा में ले जाना चाहते है।

हालाँकि वैसे तो एक मौखिक एग्रीमेंट से ही काम चलाया जा सकता है लेकिन भविष्य में किसी भी प्रकार की लीगल समस्याओं से बचने के लिए एक लिखित कॉन्ट्रैक्ट को एक Partnership Deed के रूप में अपनाया जा सकता है।

Registered तथा Unregistered पार्टनरशिप फर्म्स

अगर आपकी फर्म पार्टनरशिप फर्म अधिनियम के तहत रजिस्टर्ड है तो इसे Registered Partnership Firm के नाम से जाना जाता है लेकिन अगर आपकी फर्म इसके अंतर्गत रजिस्टर्ड नहीं है तो इसको Unregistered Partnership Firm के नाम से जाना जाता है।

हालाँकि दोनों प्रकार की फर्म्स में इनकम टैक्स एक्ट के तहत किसी भी प्रकार का अंतर नहीं किया जाता है। दोनों प्रकार की फर्म्स को लीगल माना जाता है तथा एक पार्टनरशिप फर्म को रजिस्टर करवाना अनिवार्य नहीं है।

Registered Firm के लिए आवश्यक डाक्यूमेंट्स

शामिल होने वाले पार्टनर्स के ID Proof की जरूरत पड़ती है जैसे आधार कार्ड या पैन कार्ड। इसके साथ एक Notarized Partnership Deed की सहायता से आप एक पार्टनरशिप फर्म के लिए रजिस्ट्रेशन करवा सकते है।

फर्म को रजिस्टर करने के बेनेफिट्स

  • Registered Firms अपने नाम के लिए अन्य किसी फर्म के खिलाफ केस कर सकते है लेकिन एक Unregistered Firm के लिए यह संभव नहीं है।
  • एक पार्टनरशिप फर्म के नाम पर Assets तभी खरीदे जा सकते है जब यह Registered हो।

पार्टनरशिप फर्म का PAN

एक पार्टनरशिप फर्म बनाने के बाद तथा एक Partnership Deed बनाने के बाद आपको एक फर्म PAN Card के लिए अप्लाई कर देना चाहिए। इसके लिए अलग-अलग पार्टनर्स की IDs तथा Partnership Deed की जरूरत पड़ेगी। इस PAN की सहायता से ही इनकम टैक्स डिपार्टमेंट को एक नई फर्म के निर्माण की जानकारी मिलेगी। इसके बाद फर्म के सभी टैक्स सम्बंधित मुद्दों को एक Individual Entity के रूप में देखा जाएगा।

फर्म का बैंक अकाउंट

पार्टनर्स को फर्म के नाम का बैंक अकाउंट जरूर खुलवाना चाहिए। इसकी सहायता से वे फर्म के नाम के किसी चेक का इस्तेमाल कर पाएंगे। एक फर्म के नाम का बैंक अकाउंट खुलवाने के लिए पार्टनर्स की पैन कार्ड डिटेल्स, एड्रेस प्रूफ तथा Partnership Deed की जरूरत पड़ेगी

partnership firms

पार्टनरशिप फर्म का Capitalization

कैपिटल ऐड करना

किसी भी ऑपरेशन को स्टार्ट करने के लिए फर्म को कुछ कैपिटल की जरूरत पड़ेगी। एक फर्म में इस कैपिटल को एसेट्स या कैश के रूप में जोड़ा जा सकता है। यह पूरी तरह से पार्टनर्स पर निर्भर करता है कि वो कितनी कैपिटल जोड़ना चाहते है तथा किस प्रकार की कैपिटल ऐड करना चाहते है। पार्टनर्स द्वारा बनाए गए Partnership Deed पर ये सभी चीजें निर्भर करती है।

लोन्स लेना

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि पार्टनरशिप फर्म का एक पार्टनर भी फर्म में लोन दे सकता है तथा इसपे ब्याज भी प्राप्त कर सकता है। हालाँकि यह फीचर एक Proprietorship Firm (अकेले व्यक्ति की फर्म) में उपलब्ध नहीं है। यह केवल एक पार्टनरशिप फर्म में ही संभव है। पार्टनर्स अपने ITR Filling में इस लोन के लिए Deductions भी क्लेम कर सकते है।

साइलेंट पार्टनर

एक पार्टनरशिप फर्म में साइलेंट पार्टनर का मतलब यह होता है कि उस पार्टनर ने अपना पैसा फर्म में निवेश कर रखा है तथा उसको फर्म के प्रॉफिट में भी हिस्सा मिलेगा लेकिन वो पार्टनर कंपनी की दैनिक गतिविधियों में शामिल नहीं रहता है। साइलेंट पार्टनर से सम्बंधित सभी शर्तों को Partnership Deed में शामिल किया जाना चाहिए।

पार्टनरशिप फर्म से पैसा बाहर निकलना

आइये इससे सम्बंधित कुछ नियमों के बारे में जानते है-

  • पार्टनर्स में फर्म में जो पैसा निवेश किया है उसपे वो 12% तक का ब्याज ले सकते है। इस ब्याज को उनकी इनकम का हिस्सा माना जाएगा तथा इसपे टैक्स भी लगेगा।
  • पार्टनर्स के पार्टनरशिप फर्म से सैलरी, बोनस, कमीशन आदि भी ले सकते है। इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 40 Clause B में इस सैलरी की कैलकुलेशन के लिए एक फार्मूला दिया गया है। इसके तहत किसी भी फर्म में सबसे पहले बुक प्रॉफिट की कैलकुलेशन की जाएगी (Book Profit = Net Profit – Interest Paid to Partners) इसके बाद बचे हुए प्रॉफिट पर पार्टनर्स 3 लाख की राशि तक 90% पारिश्रमिक तथा 3 लाख से ज्यादा की राशि के लिए 60% पारिश्रमिक प्राप्त कर सकते है।

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प्रॉफिट शेयरिंग

पार्टनर्स को इंटरेस्ट तथा पारिश्रमिक के भुगतान के बाद बचे हुए प्रॉफिट पर फर्म को 30% का टैक्स देना पड़ता है। हालाँकि टैक्स भरने के बाद बची हुई राशि को वापिस फर्म में लगाया जा सकता है या फिर पार्टनर्स अपने समझौते के अनुसार इसको आपस में बाँट सकते है।

हालाँकि इस प्रॉफिट शेयर पर किसी भी प्रकार का टैक्स नहीं लगता क्योंकि पार्टनरशिप फर्म में पहले से ही उन पैसों पर टैक्स लग चूका है।

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Partnership Deed में बदलाव

अगर एक पार्टनरशिप फर्म में कोई नया पार्टनर जुड़ता है या कोई पुराना पार्टनर छोड़ता है या फिर प्रॉफिट शेयर में अगर पार्टनर्स किसी प्रकार का बदलाव करना चाहते है तो ऐसी सभी स्थितियों में Partnership Deed में बदलाव किया जा सकता है। यह पूर्ण रूप से पार्टनर्स पर निर्भर करता है कि वो इसको कब और किस प्रकार से एडिट करना चाहते है।

पार्टनरशिप फर्म से सम्बंधित सभी Compliances

एक पार्टनरशिप फर्म को संचालित करने के लिए इन Compliances के बारे में आपको जरूर जानकारी होनी चाहिए –

  • Shop and establishment act – सभी राज्यों के लिए मान्य।
  • Professional tax – separately for partners as PTEC के तहत पार्टनर्स के लिए तथा PTRC के तहत कर्मचारियों के लिए इसकी कैलकुलेशन की जाती है।
  • Labour welfare fund – कुछ राज्यों में Applicable
  • TDS – Tan number
  • Income tax – annual return filing, advance tax
  • Tax audit – अगर फर्म का टर्नओवर 1 करोड़ से ऊपर जाता है।
  • GST –  अगर एक Service Firm का टर्नओवर 20 लाख से ज्यादा होता है तो उसके लिए यह एप्लीकेबल होता है तथा Goods Trading Firm का टर्नओवर 40 लाख से ज्यादा होने की स्थिति में यह लागु होता है। अन्यथा छोटे businesses के लिए GST अनिवार्य नहीं है
  • ESI and PF – कर्मचारियों की संख्या के अनुसार लागु

पार्टनरशिप फर्म्स का Dissolution

अगर पार्टनरशिप फर्म को बंद करने की नौबत आ जाती है तो उन सभी डिपार्टमेंट्स में एक सुचना पत्र देना जरूरी है जहां पर पार्टनरशिप फर्म रजिस्टर्ड है। इसमें फर्म के बंद होने से सम्बंधित कुछ प्रूफ्स की भी जरूरत पड़ सकती है।

अगर आप पार्टनरशिप फर्म के बारे में और ज्यादा जानना चाहते है तो हमारे इस वीडियो को देख सकते है –

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Koja Ram
A 3rd year B.Tech student at the NationalInstitute of Technology Jalandhar, Koja Ram’s aim is to make India financiallyeducated and independent. He has a remarkable capacity to interpret complexfinancial jargon and communicate the same in simple and easy to understandHindi for the masses. 

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